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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निष्काम और धर्म-निरपेक्ष सेवा भावना और कार्यों के अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं. मामला चाहे चरखी-दादरी में विमान दुर्घटना का हो, सुनामी का हो, ओडिशा और आन्ध्र प्रदेश के भयानक चक्रवात का हो, भुज के भूकंप का हो, गोवा को पुर्तगालियों से आजाद करने का संघर्ष का हो – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मयोगी स्वयंसेवक हर जगह उपस्थित होकर लोगों की सेवा और देश की अखण्डता के लिए सक्रिय दिख जाते हैं. यह जो सेवा भाव है, यह जो निष्काम कर्म है, यह जो त्याग और तपस्या है वही तो भारत की मौलिक संस्कृति की धरोहर है.

1904 में उर्दू भाषा के मशहूर कवि अल्लामा इकबाल द्वारा लिखित कविता “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा….” के ये शब्द आज भी आम लोगों द्वारा व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज, राजनीति और राष्ट्रीय जीवन तक विभिन्न अवसरों पर विभिन्न सन्दर्भों में प्रयोग किये जाते हैं. यह पंक्ति “…..सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए जमाँ हमारा” के साथ समाप्त होती है. जाहिर है इकबाल भारत (हिन्दोस्ताँ) के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति करते हुए भारत ही के सन्दर्भ यह कह रहे थे. लेकिन हम यहाँ उनकी इस पंक्ति जो एक दूसरे सन्दर्भ में प्रयोग करने जा रहे हैं. हस्ती नहीं मिटने के अनेक कारण हो सकते हैं. महत्वपूर्ण बात है दौर-ए-जमाँ की सदियों की दुश्मनी के बाद भी हस्ती का बना रहना. जब सारी दुनिया आपके विरुद्ध हो, वैसी स्थिति में अपना अस्तित्व बनाए रखना एक बड़ी बात होती है. और, अस्त्तित्व बनाए रखने के साथ-साथ आगे बढ़ते रहना, विकास करते जाना, निःसंदेह सिर्फ बड़ी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी बात होती है. इसी बहुत बड़ी बात के एक पर्याय के रूप में उसी हिन्दोस्ताँ में, जिसका यशोगान इकबाल कर रहे थे, एक संगठन के बारे में यह आलेख संदर्भित है. कौन है वह संगठन और क्यों ज़रूरी है उसकी चर्चा करना इस पर आगे बढ़ने के पहले कुछ बातों पर गौर करना प्रासंगिक होगा.

भारत मूलतः शान्ति, सहिष्णुता और विश्व-बंधुत्व की भूमि रहा है. तथापि इसका इतिहास विदेशी आक्रान्ताओं के हमलों की घटनाओं से भरा है. अधिकांश आक्रान्ता आये और भारत की संपदा लूट कर चले गए. भारत के राजनैतिक इतिहास में ऐतिहासिक मोड़ आया वर्ष 1526 में जब बाबर भारत आया और यहीं जम गया. उसने मुग़ल वंश की बुनियाद रखी और कालान्तर में उसके वंशजों ने अपनी सीमा का विस्तार करते हुए भारत के समाज पर गहरा असर डालना आरम्भ किया. यद्यपि भारत का भूभाग अलग-अलग राजाओं के राज्यों में विभाजित रहा था, तथापि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से यह वेदों, पुराणों, उपनिषदों के मार्ग पर चलने वाला, विष्णु के विभिन्न अवतारों और महादेव का देश रहा है. इस नाते यह हज़ारों वर्षों से एक राष्ट्र रहा है, जिसकी पहचान हिन्दू धर्म की धरा के रूप में रही है.

1526 से लेकर 1857 तक के करीब-करीब साढ़े तीन सौ वर्षों का समय भारत की मौलिक सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरुप पर प्रहारों का समय था. शासन-संचालन में राजधर्म की नीतियों के अंतर्गत मुग़ल शासक अकबर और शाहजहाँ द्वारा जो भी कुछ समदर्शी कदम उठाये गए थे, 1658 से 1707 तक के 50 वर्षों के अपने शासन काल में औरंगजेब ने उन्हें तहस-नहस कर दिया. तब से लेकर काफी लंबा समय गुजर गया, लेकिन औरंगजेब ने भारत में इस्लामी वर्चस्व का जो अभियान चलाया था, उसका असर गहरा होता गया. इस गहरेपन की अंतिम परिणति मुग़ल शासन के समाप्त होने के 50 वर्ष बाद 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के जन्म के रूप में हुयी. 1857 के ग़दर में और उसके बाद की अवधि में अंग्रेजों के विरुद्ध देश के सभी वर्गों और धर्मों के लोग एक साथ लड़ रहे थे. लेकिन मुस्लिम लीग का गठन भारतीय मुसलामानों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर किया गया. शुरुआत में यह अंग्रेजी राज के हितों के पक्ष में था और भीतर-भीतर मुगलों के खोए शासन को भारत में दोबारा स्थापित करने का मंसूबा पल रहा था. इस मंसूबे का प्रकटन मुस्लिम लीग में मोहम्मद अली जिन्ना के उदय के साथ हुआ. सभी जानते हैं कि जिन्ना ने एकजुट और संयुक्त भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते-करते 1940 में अपने इरादे साफ़ कर दिए. सम्पूर्ण भारत पर दोबारा मुसलामानों का शासन स्थापित करने की उम्मीद समाप्त होते देख अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने प्रस्तावित स्वतन्त्र भारत से पृथक एक मुस्लिम राज्य के गठन का आह्वान कर दिया. उसके बाद के सात वर्षों में जो हुआ वह किसी से छिपा नहीं है. किसने किया यह बार-बार बताने की ज़रुरत नहीं है. लेकिन 1947 में स्वत्रन्त्रता मिलने, भारत के विभाजन के रूप में मुस्लिम लीग का उद्देश्य पूरा होने के बाद कुछ वर्षों में भले ही पाकिस्तान में मुस्लिम लीग का अस्तित्व समाप्त लो गया, भारत में औरंगजेबी सपना अभी भी ज़िंदा है और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नाम से एक-दो राज्यों में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का अवशेष सक्रिय है.

इस प्रकार 1904 में जहाँ उपर्युक्त पंक्ति वाली कविता में ही इकबाल ने कहा कि “मज़हब नहीं सिखाता,आपस में बैर रखना।हिन्दी हैं हम वतन हैं,हिन्दोस्ताँ हमारा।” दिलचस्प बात यह है कि इसके ठीक दो वर्ष बाद 1906 में “हमवतनों” के हिन्दोस्ताँ में धर्म के नाम एक तबका खडा होता है और उसे भारत में अपने धर्म के लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं लगने लगते हैं और भारत के इतिहास में पहली बार धर्म के आधार पर एक राजनैतिक दल का जन्म हो जाता है – अखिल भारतीय मुस्लिम लीग. “हिन्दी हैं हम वतन हैं,हिन्दोस्ताँ हमारा” गाते-गाते स्वयं अल्लामा इकबाल कहाँ पहुँचे यह 1930 के दिसम्बर माह में जाहिर हुआ, जब गंगा के किनारे इलाहाबाद में एक शायर बड़े जोश में अपनी तक़रीर पेश कर रहा था. ये तक़रीर 17साल के बाद होने वाले इंसानी तारीख के सबसे बड़े और खूनी पलायन की बुनियाद रखने जा रही थी. तक़रीर कुछ यूं थी कि – “मैं पंजाब,नार्थ वेस्ट फ्रंटियर,सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूप में देखना चाहता हूँ. ब्रिटिश राज के तहत या फिर उससे बिना भी एक खुद-मुख्तार नार्थ-वेस्ट भारतीय मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों का आखिरी मुस्तकबिल है.” यह चर्चा का एक अलग विषय है. फिलहाल एक और बिंदु पर गौर कर लेना ठीक रहेगा.

इधर भारत में यह सब चल रहा था तो भारत के बाहर मुस्लिम जगत में खलीफा की गद्दी की लड़ाई चल रही थी. मामला भारत से जुड़ा नहीं था. भारत के बहुमत मुसलमानों को भी खलीफा की गद्दी यानी खिलाफत से बहुत लेना-देना नहीं था. लेकिन कुछ लोग थे. सच में कुछ ही लोग थे भारत के मुस्लिम समाज में जिन्होंने तुर्की में इस्लाम के खलीफा सुल्तान की गद्दी और उसका साम्राज्य बचाने के लिए भारत में एक आन्दोलन का सूत्रपात किया, जो तुरत-फुरत में मोहनदास करमचंद गाँधी के लिए राजनीति में आगे बढ़ने का एक अमोघ अस्त्र बन गया. मई 1919 से खिलाफत सभाओं में गांधी जी के भाषण शुरू हुए। खिलाफतवादियों ने 17अक्टूबर, 1919को ‘खिलाफत दिवस’मनाया। उसका गांधी जी ने खूब प्रचार किया था. दिल्ली में 23नवंबर1919को ‘अखिल भारतीय खिलाफत कांफ्रेंस’हुई जिसकी अध्यक्षता गांधी जी ने की थी.यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि खिलाफत आन्दोलन का अंगरेजी हुकूमत के विरोध या भारत की आज़ादी से कोई सम्बन्ध नहीं था, यह विशुद्ध रूप से गाँधी द्वारा भारत राजनीति में धर्म का प्रथम प्रयोग था, जिसकी अंतिम परिणति खलीफा के अनुयायियों द्वारा भारत विभाजन के रूप में हुई. इस आन्दोलन के असली चरित्र को समझा था डॉ. भीम राव आम्बेडकर ने, जिन्होंने कई वर्षों के बाद अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ओ पाकिस्तान’ (1940) में लिखा, ‘सचाई यह है कि असहयोग आंदोलन का उद्गम खिलाफत आंदोलन से हुआ,न कि स्वराज्य के लिए कांग्रेसी आंदोलन से. खिलाफतवादियों ने तुर्की की सहायता के लिए इसे शुरू किया और कांग्रेस ने उसे खिलाफतवादियों की सहायता के लिए अपनाया. उसका मूल उद्देश्य स्वराज्य नहीं,बल्कि खिलाफत था और स्वराज्य का गौण उद्देश्य बनाकर उससे (बाद में) जोड़ दिया गया था,ताकि हिंदू भी उसमें भाग लें।”इसी प्रकार एनी बेसेंट के शब्दों में,‘खिलाफत-गांधी एक्सप्रेस’का तूफान चला। यह आँधी ऐसी चली कि कांग्रेस की पिछली परंपरा झटके में उड़ गई।”

यह परिस्थितियाँ थीं भारत में बीसवीं सदी के प्रथम दो दसकों में. वैसी परिस्थिति में जब भारत को किसी सुलतान की सल्तनत या किसी खलीफा की खिलाफत बना देने के लिए अनेक तर्कों के आधार पर और अनेक रहस्यों तथा मंसूबों को छिपा कर आन्दोलन चलाये जा रहे हों, धर्म के आधार पर समाज को बाँटने के लिए राजनैतिक दल खड़ा किया जा रहा हो, तब किसी-न-किसी को भारत की भारतीयता बनाए रखने के लिए, भारत की मूल संस्कृति और आत्मा की रक्षा के लिए उत्तरदायित्व और साहस के साथ आगे आना था, समाज को एकजुट करना था, एकजुट करने के लिए एक सार्थक-सशक्त संगठन बनाना था. साहस का प्रदर्शन करते हुए उसी उत्तरदायित्व का सार्थक-सशक्त निर्वहन करते हुए मुस्लिम लीग बनने के 19 वर्ष बाद और खिलाफत आन्दोलन के 6 वर्ष बाद डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक संगठन का सूत्रपात किया, जिसे आज सम्पूर्ण विश्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) के नाम से जानता है. और इस संगठन पर अल्लामा इकबाल की वह पंक्ति सटीक बैठती है, “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…..”. सवाल बड़े दिलचस्प हैं. जिज्ञासा और उत्सुकता पैदा करने वाले सवाल हैं. सवाल कि नब्बे वर्ष के अपने इतिहास में ‘दौर-ए-जमाँ’ की शत्रुता और षड्यंत्रों के बीच अटल-उत्तुंग हिमालय की तरह कैसे खड़ा है यह संगठन? आगे इसका उत्तर तलाशने की कोशिश की गयी है.

एक साधारण आदमी के रूप में आरएसएस जैसे विशाल और व्यापक संगठन के बारे में सोचते समय मन में यह चिंतन चला स्वाभाविक है कि क्या चल रहा होगा उस समय डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार जैसे महामानव के मन में? क्या परिकल्पना रही होगी उनकी भविष्य को लेकर? 1925 से लेकर 1940 में अपनी मृत्यु तक क्या किया होगा उन्हों्ने, संगठन का कौन सा विज्ञान और सिद्धांत लागू किया होगा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठनात्मक संचालन, इसकी प्रगति, इसकी गतिविधियाँ, इसकी प्रतिष्ठा दबी जुबान वह ‘दौर-ए-जमाँ’ भी करता है, जिसके दसकों बीत गए इस संगठन को समाप्त करने की कुचेष्टाओं में? कभी-कभी तो मन यह सोचने पर बाध्य हो जाता है कि कैसा होता आज का भारत अगर नहीं रहा होता राष्ट्रीय स्वयं संघ.

कौन वृक्ष कितना टिकेगा यह इस पर निर्भर करता है कि उसकी जडें कहाँ हैं और कितनी गहरी हैं. इसी प्रकार कोई परिवार अगर एकजुट है, तो उसके पीछे उस परिवार की सांस्कारिक परम्परा का प्रमुख योगदान होता है. परिवार में कोई लिखित समझौता नहीं होता. प्रत्येक सदस्य को पता होता है कि उसकी भूमिका क्या है. हर कोई हर किसी के अधिकार का सम्मान करता है. हर किसी को अपना दायित्व पता होता है. पिता को पता है उसे क्या करना है. न केवल एक गृहिणी बल्कि कामकाजी माँ को भी पता होता है उसे क्या करना है. बच्चों को पता है उन्हें क्या करना है. किसी घर में माँ से यह नहीं कहना पड़ता कि चलिए आपकी रसोई का समय हो गया, बच्चों के भोजन का समय हो गया, पति के बाहर काम पर निकलने का समय हो गया. इसी प्रकार पिता, बच्चों को उनके कार्य की याद नहीं दिलानी पड़ती. घर में कोई आकस्मिक परिस्थिति होने पर सुनते ही घर के लोग दौड़ पड़ते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन इसी प्रकार परिवार की समझ के साथ चलता है. इसकी पहचान एक राजनैतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगठन के रूप में है, जो हिन्दू राष्ट्रवादी सिद्धांत पर कार्य करता है. एक पोषक, एक विचार, मानसिक और शारीरिक स्तर पर एक अनुशासन के साथ यह समाज और राष्ट्र की सेवा का कार्य करता है. एक ओर सभी संगठन में सदस्यता की पर्ची होती है, चंदे वसूले जाते हैं वहीं आरएसएस में ऐसा कुछ नहीं होता. इस संगठन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हिन्दू शब्द के प्रति इसका धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण है. यही कारण है कि राजनैतिक कारणों से भले ही लोग कुछ भी कहें, इस संगठन ने धार्मिक आधार पर किसी भी धर्म की आलोचना नहीं की है और न ही किसी भी धर्म के विरुद्ध कोई कारवाई की है. बल्कि इसके विपरीत विभिन्न धर्मावलम्बियों के लिए इस संगठन के अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम संचालित होते हैं.

यह सोचना सचमुच अद्भुत लगता है कि विगत पंचानबे वर्षों में भारत में अनेक पुराने संगठन और राजनैतिक दल खंडित हुए. अनेक नए संगठनों और दलों का जन्म हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र संगठन है जिसमें कोई विभाजन नहीं हुआ. विभाजन की कौन कहे, कभी यह न सुनने में आया, न पढ़ने में कि इस संगठन में कोई गुटबाजी हुयी हो. यह तो हो नहीं सकता कि इसकी सभाओं में, बैठकों में वाद-विवाद नहीं होते होंगे. पर, नब्बे साल में कोई तो एक ऐसा होता जो ‘स्ट्रेटेजी’ के नाम पर, ‘टैक्टिक्स’ के नाम पर, वर्ग या वर्ण या जाती या भाषा और क्षेत्र के आधार पर अपनी आकांक्षाओं की अलग राह चुनता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. और यही इस संगठन को बाकी सभी से अलग करता है. इसकी प्रचंड शक्ति और अटूट संगठनात्मकता के पीछे एक और महत्वपूर्ण बात है. वह है इसके सिद्धांत और व्यवहार में अतुलनीय एकरूपता. आप सम्पूर्ण भारत घूम आइये. विभिन्न संगठनों और दलों की सभाओं में चले जाइए. सभी के शीर्ष नेतृत्व के वक्ताओं में अलग-अलग भाषाओं के लोग मिलेंगे. वे या तो हिंदी में बोलेंगे, या अंगरेजी में बोलेंगे और अनेक ऐसे भी होंगे जो न हिंदी जानते हैं, न अंगरेजी, इसलिए वे अपने राज्य की भाषा में बोलेंगे. इधर आरएसएस में शीर्ष नेतृत्व के लोग उत्तर से हों, पश्चिम से हों, पूरब से हों या दक्षिण से हों, अपने-अपने राज्य की भाषा के अलावा सभी हिंदी में बोलना जानते हैं. वहाँ किसी प्रकार का भाषाई वर्चस्ववाद का संकट नहीं है.

सभी जानते हैं कि इस संगठन का एक सालाना गुरु दक्षिणा समारोह होता है. इस संगठन के साथ यह अद्भुत परम्परा है कि गुरु दक्षिणा में रसीद नहीं कटती. यह समानता और आर्थिक रूप से कमजोर लोग, जो बहुत बड़ी रकम नहीं दे सकते, उनके आत्मसम्मान की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण है. निःसंदेह इससे संगठन के भीतर गरीब और धनवान के आधार पर स्थान और सम्मान की कोई स्थिति नहीं बनती. जहाँ सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में लोग एक साथ हों, और किसी को पता नहीं चले कि गुरु-दक्षिणा में कौन कितना दे रहा है, इससे जो समान भाव उत्पन्न होता है, वह किसी भी संगठन को एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए बड़ी ताकत होती है. इसी प्रकार, इस संगठन के शिविरों में सभी के लिए एक पंगत, सभी के लिए एक भोजन, सभी के लिए एक समान आसन का पालन होता है. प्रभाव यह कि जातियों और समूहों की सारी दीवारें ध्वस्त हो जातीं हैं. एक वाकया है, जब मोहनदास करमचंद गांधी1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में गए थे. वहाँ उन्हों ने पूर्ण अनुशासन देखा. गांधी स्वयं छुआछूत के खिलाफ थे. उस शिविर में भी उन्हें छुआछूत का कहीं नामो-निशाँ नहीं मिला. आश्चर्यचकित थे गांधी. समाज में जिस बुराई को समाप्त करने के लिए वे कठिन संघर्ष कर रहे थे, उस बुराई को आरएसएस पहले ही से समाप्त कर चुका था. गांधी ने व्यक्तिगत रूप से इस विषय में शिविर में लोगों से पूछताछ की और इस बात से सन्तुष्ट हुए की वहां लोग एक साथ रह रहे थे और एक साथ भोजन कर रहे थे. बहुत कम लोग जानते होंगे कि आरएसएस का सम्बद्ध संगठन सेवा भारती ने जम्मू एवं काश्मीर में आतंकवाद से परेशान 57 अनाथ बच्चों को गोद लिया हुआ है जिनमें 38 बच्चे मुसलमान और 19 हिन्दू हैं. संकट के समय देश के काम आने का इस संगठन का उदाहरण भी अद्वितीय है. 1962 में जब चीन ने भारत पर सैन्य आक्रमण किया और दोनों देश में युद्ध चल रहा था, उस समय आरएसएस की भूमिका से तत्कालीन प्रधानमन्त्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंिने 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में सम्मिलित होने के लिए आरएसएस को आमंत्रित किया था. यह भी उल्लेखनीय है कि महज दो दिनों की सूचना पर तीन हज़ार से अधिक स्वयंसेवक पूर्ण पोशाक में उस परेड में शामिल हो गए थे, जिस परेड के लिए महीना भर से अधिक समय तक अभ्यास चलता रहता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निष्काम और धर्म-निरपेक्ष सेवा भावना और कार्यों के अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं. मामला चाहे चरखी-दादरी में विमान दुर्घटना का हो, सुनामी का हो, ओडिशा और आन्ध्र प्रदेश के भयानक चक्रवात का हो, भुज के भूकंप का हो, गोवा को पुर्तगालियों से आजाद करने का संघर्ष का हो – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मयोगी स्वयंसेवक हर जगह उपस्थित होकर लोगों की सेवा और देश की अखण्डता के लिए सक्रिय दिख जाते हैं. यह जो सेवा भाव है, यह जो निष्काम कर्म है, यह जो त्याग और तपस्या है वही तो भारत की मौलिक संस्कृति की धरोहर है. हर मिट्टी की अपनी विशेषता होती है. उस विशेषता का सम्मान करना उस मिट्टी से जुड़े रहना होता है. जिसे इस मिट्टी की सुगंध भा गयी वह इस मिट्टी का हो गया. फिर यह मिट्टी उसे अपना पोषण देने लगती है और वह एक बीज से विशाल वृक्ष बन जाता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत की मिट्टी से स्वयं को एकाकार कर लिया. तो फिर उसे विशाल वृक्ष बनने से कौन रोक सकता था. न चन्दा न चुनाव, न पर्ची न प्रचार, फिर भी प्रगति धुआँधार! कुछ तो सबसे अलग है इस संगठन में. आइये उन चीजो पर गौर करें.

भारतीय संस्कृति में जीवन-संघर्ष का एक अनमोल दर्शन व्याप्त है. इसकी व्याप्ति की विशालता का अवलोकन करके ही दुनिया भर के लोगों के मन में हमारी संपदा के प्रति मोह उत्पन्न हुआ. हमारी सांस्कृतिक विरासत में संघर्ष और सफलता के ऐसे अविस्मरणीय उदाहरण उपस्थित हैं, जिनका साक्षात्कार कर हम चमत्कारपूर्ण परिणाम हासिल कर सकते हैं. आरएसएस ने भारतीय दर्शन के जीवन-संघर्ष पर विश्वास किया. यह इसका पहला संबल बना. दूसरा संबल बनी सहानुभूति. सहानुभूति से पैदा होते हैं सद्विचार, सह-अस्तित्व की भावना, परस्पर कल्याण की कामना, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की उदात्त भावना से ओत-प्रोत ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की दिशा में सद्प्रयास. इस संगठन ने सहानुभूति का पालन किया है. कर्म सफलता का प्रमुख आधार होता है. भारतीय संस्कृति कर्ममय है. इस संस्कृति में कोई सेवा कार्य तुच्छ नहीं है. कर्म की दिशा लक्ष्य की ओर होती है. लक्ष्य साधने हेतु साधना होनी चाहिए. साधना से साध साधती है. विवेक के मार्गदर्शन में जब बुद्धि का श्रम के साथ संयोग होता है और इस संयोग पर जब लगन का लेप चढ़ जाता है तब जो परिणाम सृजित होता है वह निराकार भाववाचक संज्ञा का स्वरूप त्याग कर एक साकार, सगुण, सप्राण, मनभावन एवं दीप्त मूर्त रूप में विश्व को दिखाई देने लगता है. आरएसएस ऐसे दृश्य उत्पन्न करने वाले असंख्य लोगों से भरा संगठन है जो अपने काम की राह पर निष्काम भाव से बढ़ रहे हैं. यह कर्म की भावना आरएसएस की तीसरी ताकत है. प्रेम में बड़ी शक्ति होती है. प्रेम न हो तो प्रगति कठिन हो जाती है. प्रेम सकारात्मक परिवर्तन का आधार है. प्रेम परिवर्तित करता है – द्वेष को राग में, विराग को अनुराग में, कुंठा को उल्लास में, नैराश्य को उत्साह में, विष को अमृत में; यानी हर नकारात्मकता का सकारात्मकता में परिवर्तन का मूल है प्रेम. माँ बच्चे की जिद को प्रेम से समर्पण में बदलती है. प्रेम से रत्नाकर वाल्मीकि बन जाता है. प्रेम से मीरा विषपान कर प्राणवान हो जाती है. प्रेम अपने परिवार से, प्रेम अपने समाज से, प्रेम अपने संगठन से, प्रेम अपने राष्ट्र से, प्रेम अपनी संस्कृति से जब अपने मन का, वचन का, कर्म अविभाज्य हिस्सा बन जाए तब फिर प्रगति सुनिश्चित हो जाती है. आरएसएस ने अपने समस्त दर्शन और कर्म में प्रेम को अपना आधार बनाया. यह इसकी चौथी सबसे बड़ी शक्ति है.

हम कह सकते हैं कि यह अखंड भारत के लिए जीवन-संघर्ष से जुड़ा जन-जन के प्रति सहानुभूति से साथ निष्काम कर्म के पथ पर लक्ष्य के ओर प्रेमपूर्वक निरंतर बढ़ने का अभियान है. और जब ये सारी भाववाचक शक्तियां एक साथ एक संगठन में समाहित हों, तो फिर मन जाग जाता है, मन जगा रहता है तो तन चलता है और यह बोध नहीं हो पाता कि यह तन चल रहा है, कैसे चल रहा है. बस चलता जाता है. सोचने वाले सोचते रहते हैं. इसी प्रकार इन अदृश्य शक्तियों के सहारे चल रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ!

रवि प्रकाश (लेखक भारत विकास परिषद के पश्चिमी रीजन के रीजनल सेके्रटरी (सेवा) हैं)

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