Opinion

वसंत पंचमी को शिवरात्रि का निमंत्रण देते हैं मिथिलावासी

हाथियों – घोड़े – ऊँटों के साथ निकलती है शिव बारात जिसमें सभी पूर्व रजवाड़े भाग लेते हैं

वसंत पंचमी का पर्व देश भर में विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के रुप में मनाया जाता है, लेकिन बैद्यनाथ धाम देवघर ( झारखंड) के विश्व प्रसिद्ध बाबा रावणेश्वरवैद्यनाथ मंदिर में यह दिन ‘बाबा बैद्यनाथ-माता पार्वती के तिलकोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है।तिलक की इस रस्म को पूरा करने के लिए भगवान शंकर की ससुराल यानी मिथिलांचल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग तरह का कांवर लेकर बाबा धाम पहुंचते हैं। इस दिन बाबा का तिलकोत्सव कर अबीर-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई देते है और शिवरात्रि के अवसर पर शिव विवाह में शामिल होने का निमंत्रण एवं संकल्प देते – लेते हैं।

इसके बाद ही माँ पार्वती एवं भगवान शंकर के विवाहोत्सव की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं।उल्लेखनीय है कि देवघर का शिव बारात अपनी अनुपम सज्जा के कारण विश्व प्रसिद्ध है। चंदन नगर ( बंगाल) से विद्युत सज्जाकार यहाँ आकर पूरे नगर की सजावट करते हैं और देश भर के पूर्व रजवाड़े अपनी तरफ से हाथी – घोड़े – ऊँट आदि यहाँ भेजते हैं। सिर्फ बारात निकालने का खर्च दस करोड़ रुपये से अधिक का होता है।

बसंत पंचमी के अवसर पर भगवान शंकर के तिलकोत्सव पर मिथिलावासी बाबा वैद्यनाथ को अपने खेत में उपजी धान की पहली बाली और घर में तैयार घी अर्पित करते हैं और बेसन का लड्डू चढ़ाते हैं। इसके बाद एक दूसरे को गुलाल लगाकर तिलकोत्सव की खुशियां बांटते हैं। बताया जाता है कि यह परंपरा युगों से चली आ रही है। इस तिलकोत्सव का ९०० वर्षों से अधिक समय का लिखित इतिहास उपलब्ध है।

पहले ऋषि मुनि भी वसंत पंचमी को यहां आते थे। बाबा बैद्यनाथ के दरबार की कथा निराली और एतिहासिक है। भारतीय सभ्यता की थाती में (धी) बेटी और सवासिन (बहन) का मायके के धन पर अंश है। यह परंपरा है। बाबा बैद्यनाथ को तिलक चढ़ाने के पीछे भी यही कहानी है।

तिरहूत यानी मिथिलांचल, हिमालय की तराई में बसा है। यहां के लोगों का मानना है कि हमलोग हिमराज की प्रजा हैं और पार्वती हिमालय की बेटी हैं। वे अपने को लड़की पक्ष का मानते हैं और बसंत- पंचमी के दिन तिलक चढ़ाकर फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को बारात लेकर आने का न्यौता बाबा वैद्यनाथ के पंडों को देते हैं।

यही परंपरा पीढ़ी- दर -पीढ़ी चल रही है। पार्वती हिमालय की बेटी है इसलिए उस परंपरा को आज भी निभा रहे हैं और बसंत पंचमी को लड़की पक्ष की तरह साथ लाए धान की बाली, घी, बेसन का लड्डू आदि अर्पित करते हुए तिलक की परंपरा को पूर्ण करते हैं। बाबा भोलेनाथ, बाबा भैरवनाथ की पूजा करने के बाद गुलाल खेलते हैं और मिथिला को लौट जाते हैं। सारी रस्म इनके पुरोहित कराते हैं।

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