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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र मे भारत का योगदान: भाग 14

विशेष माहिती श्रृंखला : भाग 14 (14-30)

सुगंधित पदार्थ और भारतीय विज्ञान

वैदिक काल से ही हमारे ऊष्ण देश में, सुगंधित द्रव्यों की आवश्यकता समझी जाती थी। सुगंधित जल, अगरबत्ती पाउडर व इत्र आदि बनाने की विधियां गंगाधर के ‘गंधसार’ बृहत् संहिता, मानसोल्लास, गंधवाद एवं गंधयुक्ति जैसे कई प्राचीन ग्रंथों में दी गयी हैं। कुछ सुगंधित द्रव्यों के गंधयुक्त अवयवों में चिकित्सीय आयुर्वेदिकीय गुणधर्म भी होते हैं, उदाहरणत: सुकुमार तेल, महानारायण तेल गंधयुक्त पदार्थों में चंदन, उसीर, केसर, पतरलिया, आदि आते हैं। फूल पत्ते व फल आदि सुगंधित स्रोतों के आधार पर इन्हें 8 वर्गों में बांटा जाता है।

गंगाधर ने 6 प्रकार के सुगंधित पाउडर या पेस्ट बनाने की विधि का वर्णन किया है। आज की भांति ही प्राचीन भारत में भी सुंगधित द्रव्यों के व्यापार में लाभ (100 गुणा) काफी अधिक होता था। इसका उल्लेख पंचतंत्र में मिलता है।

प्रसाधन:

भारत में प्राचीन काल से पुरुष व स्त्रियां, दोनों ही प्रसाधक द्रव्यों का उपयोग करते थे। गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडा रखने के लिये चंदन की लकड़ी के बारीक पेस्ट का शरीर पर लेपन, सिंदूर, माथे पर तिलक के रूप में गोरोचन, लिपिस्टिक व नाखून पालिश के रूप में लाख एवं चेहरे के लेप व बाल धोने के लिए लेड कार्बोनेट आदि सुगंधित द्रव्य उपयोग के कुछ उदाहरण हैं।

अथर्ववेद में बालों की वृद्धि में सहायक एक पदार्थ का उल्लेख है। बोवर की पांडुलिपि में ताम्र व लौह सल्फेट को बेलेरिक हरड़ के तेल के साथ उबालकर बाल रंजक बनाने की विधि का वर्णन है। साबुन बेरी (पीलू) या साबुन पाढ अर्थात शिकाकाईके (Decoction) से बाल धोने की चर्चा की गयी है।

चक्रपाणि (900 सदी ई.) ने नहाने के साबुन बनाने की प्रक्रिया को बताया है। आंखों की सजावट के लिये अंजन व सुरमें के बारे में कहा गया है । विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्राकृतिक एन्टिमनी सल्फाइड को अंजन के रूप में प्रयोग की बात ‘रसरत्न समुच्चय’ में है। भौहों व बरौनी (Eyelash) के लेपन हेतु सुरमा एन्टिमनी स्टिबिनाइट (Sb2 53 ) व सुरमी (गैलेना- PbS) और दोनों के मिश्रण कोहल का उपयोग होता था।

घी के जलाने से प्राप्त कालिख को काजल के रूप में उपयोग करने की परंपरा रही है। आज की भांति ही खाने के साथ हल्दी पाउडर लेने से त्वचा का रंग साफ होने की संभावना है । बाल व नाखून रंगने के लिये मेंहदी, उस समय भी इस्तेमाल की जाती थी ।

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