Opinion

वंशवाद की राजनीति या राजनीति में वंशवाद: देश के लिए धीमा जहर

पुरातन काल से आज तक कुछ अपवादों को छोड़कर राजाओं के पुत्र ही राजा और सम्राटों के पुत्र ही सम्राट हुए हैं। खून का महत्व अधिक रहा है योग्यता से. यह स्थिति भारत ही नहीं वरन विश्व के विभिन्न देशों में अनुसरण किया जाता था।अधिकांश देशों में राजनीतिक राजवंश हैं और राजनीति में वंशानुगत उत्तराधिकार भी एक वास्तविकता है । ब्रिटैन में नॉर्मन्स, प्लांटैजेनेट्स, ट्यूडर, स्टुअर्ट्स, हनोवेरियन और विंडसर राज परिवार प्रमुख रूप से राज्य करता था. वर्तमान में विंडसर परिवार की एलिज़ाबेथ (द्वितीय) वहां की साम्राज्ञी हैं जिन्होंने १९५२ में जॉर्ज षष्ठम के बाद सत्ता सम्हाली। यह न केवल उत्तर कोरिया जैसे निरंकुश देशों में बल्कि भारत जैसे लोकतंत्र में भी मौजूद है। इसी बीच एक बड़ी घटना घटी।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने गणराज्य बनने के लिए ब्रिटिश ताज को फेंकते हुए इस भ्रम पर भी विराम लगा दिया कि कुछ लोग शासन करने के लिए ही जन्में हैं क्योंकि उनका जन्म एक विशेष परिवार में हुआ है।ऐसा इसलिए संभव हुआ कि लोकतंत्र में वंशानुगत शासन (Hereditary Rule) को अच्छा नहीं माना जाता है। लोकतंत्र तो कर्म की कुशलता के मार्ग को प्रशस्त करता है जबकि वंशवाद की राजनीति में कर्म का कोई स्थान नहीं है।

इंडोनेशिया, जो दुनिया के तीसरे सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इस तरह के वंशवादी उत्तराधिकार से खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है किन्तु विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला लोकतंत्र भारत वंशवादी राजनेताओं के साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है, हालांकि राजनीतिक वर्चस्व वाले परिवारों की संख्या घट रही है। दक्षिण एशिया में दो राजनीतिक राजवंशों का दबदबा रहा है। “एक नेहरू-गांधी परिवार भारत में जो कई वर्षों तक शीर्ष पर रहा है, और दूसरे पाकिस्तान में भुट्टो-जरदारी परिवार सत्ता में रहा है। दोनों कुटुम्बों ने हत्याओं, त्रासदियों, भ्रष्टाचार के घोटालों और सार्वजनिक नतीजों को इस कदर झेला है, कि आने वाली पीढ़ी में से किसी के भी राजनीति में की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी दोनों परिवार अभी भी अपने वर्चस्व को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसके उदाहरण हमें अतीत में भी मिलते हैं।

“जिए भुट्टो! ” यानी ‘भुट्टो ज़िंदाबाद’ सिंध, पाकिस्तान में एक रैली में भाग ले रहे एक किसान चिल्ला रहा था तो लगभग उसी समय असम राज्य के एक राजनेता देवकान्त बरुआ “इंदिरा इंडिया है, इंडिया इंदिरा है!” की घोषणा भारत में करता है। उसी का अनुकरण की घटना है – “ज़िया शौनिक एक हो!” (ज़िया के सैनिक, एक साथ खड़े हों!) ढाका, बांग्लादेश में राजनीतिक कार्यकर्ता इसका जाप करे रहे हों।ये तीन अभिव्यक्तियाँ दक्षिण एशियाई लोकतंत्रों के एक विवादास्पद और, शायद, अलोकतांत्रिक पहलू को रेखांकित करती हैं – पारिवारिक राजवंशों की भारी राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति।

शिक्षा की कमी, विशेष रूप से गरीबों में (जो इन देशों में बहुसंख्यक हैं) सबसे महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। जाहिर है, जिन लोगों को शिक्षित नहीं किया गया है, उनके पास पार्टी द्वारा अपना सुंदर तस्वीर चित्रित करने और विरोधी पक्ष को गलत बताने के अलावा कुछ भी नहीं। इन भोले -भाले अशिक्षित जनता को भुलावे में रखा,सरकारी अनुदानों ने उन्हें पंगु बना दिया है। इसलिए, ऐसे लोगों के लिए यह अधिक आकर्षक हो जाता है कि वे किसी विरोधी उम्मीदवार के साथ अपनी किस्मत का परीक्षण करने के बजाय किसी ऐसे व्यक्ति को वोट दें जो परिचित लगता है।देखा जाए तो उन लोकतांत्रिक पार्टियों में अधिकाँश में दूर -दूर तक लोकतंत्र नहीं है।कई राजनीतिक दलों में लोकतंत्र की जबरदस्त कमी है। ”इन सभी वंशवादी दलों की रैंक और फाइल को पता है कि पार्टी नेतृत्व किसकी किस्मत में है और इन परिवार आधारित-संचालित पार्टियों में जमीनी स्तर का कार्यकर्ता पार्टी का मुखिया बनने का सपना तक भी नहीं देख सकता है।

भारत में नेहरू-गाँधी के अलावा सिंधिया- परिवार, अब्दुल्ला -परिवार, उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव परिवार व बिहार के लालू यादव परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, महाराष्ट्र में पवार व ठाकरे परिवार आदि इसी श्रेणी में वे सभी प्रसिद्ध नाम हैं जिन्हें हम राष्ट्रीय स्तर पर जानते हैं। स्थानीय पदानुक्रमों में आंध्र प्रदेश में रेड्डी परिवार, तेलंगाना में राव परिवार, असम के गोगोई, छत्तीसगढ़ के जोगी और शुक्ल, झारखंड के महतो शामिल हैं, और ये कुछ ही नाम हैं। भारत में राजनीतिक राजवंशों का एक समृद्ध हिस्सा है।

किसी का अपने पैतृक व्यवसाय में शामिल होना स्वाभाविक है। जैसे कि महान क्रिकेटर के बेटे का घर के माहौल से क्रिकेट सीखना भी स्वाभाविक है। किसी दिग्गज अभिनेता के बेटे का फिल्मों में आना भी स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब क्रिकेटर का बेटा प्रतिभावान न होने पर भी दशकों तक टीम में बना रहे या फिल्म स्टार के बेटे को कई फ्लाप फिल्में देने के बाद भी बड़े बैनरों की फिल्मों में काम मिलता रहे। कुछ इसी तरह राहुल गांधी, अखिलेश यादव, एचडी कुमारस्वामी जैसे नेता कई विफलताओं के बाद भी अपनी-अपनी पार्टियों को पारिवारिक कंपनियों के रूप में चला रहे हैं।

दक्षिण एशिया में अब ऐसे परिवार में एक नाम और जुड़ गया है। अपनी शक्ति के चरम पर, श्रीलंका के राजपक्षे वंश के चार भाइयों ने राष्ट्रपति पद और प्रधान मंत्री कार्यालय के साथ-साथ वित्त, आंतरिक और रक्षा विभागों को भी हथिया लिया। लेकिन जब राजपक्षे का परिवार अजेय लग रहा था, तो उनके अपने स्वयं द्वारा बनाए गए आर्थिक संकट ने श्रीलंका को केवल 30 महीनों में दिवालिया कर दिया। तीनों राजपक्षे ने हाल ही में अपने कैबिनेट पदों से इस्तीफा दे दिया, प्रधान मंत्री महिंदा राजपक्षे ने पिछले सप्ताह पद छोड़ दिया।नाराज प्रदर्शनकारियों ने इस सप्ताह परिवार के घर पर हमला किया और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को उनके भारी सुरक्षा वाले परिसर के बाहर नहीं देखा गया है।वर्षों तक, श्रीलंका के राजपक्षे राजवंश ने दादागिरी के साथ द्वीप राष्ट्र पर शासन किया, जिससे राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और अन्य में भय पैदा हो गया। अब प्रदर्शनकारी उन्हें उनके घरों और सत्ता से बाहर खदेड़ रहे हैं। लेकिन क्या इससे दक्षिण एशिया के इन सभी शक्तिशाली राजनीतिक परिवार का अंत हो जायेगा?

परिश्रम, दक्षता और योग्यता वाली राजनीति की जगह तेजी से चाटुकारिता और परिवारवाद वाली राजनीति ले रही है। वंशवाद की राजनीति के कारण सत्ता चंद लोगों के हाथों में रहकर देश को नुकसान पहुंचा रही है। सत्ता के रोटेशन और इसे खोने के डर के बिना, नेताओं की बहुत ही कम या ना के बराबर जवाबदेही रह गई है। जैसा कि पहले चर्चा की गई है, भारत में राजनीतिक राजवंश विभिन्न रूपों और विभिन्न अंशों में मौजूद हैं। यह न केवल “राष्ट्र कल्याण” एजेंडा को “परिवार कल्याण” में रूपांतरित करता है, बल्कि भ्रष्टाचार और पक्षपात वाले लोकतंत्र के उन्मूलन को भी कमजोर करता है। यही नहीं, मतदाताओं को कम विकल्प देता है और पहले परिवार के लिए खजाना भरकर, नागरिकों को नगण्य सुविधाएं मिलती है जो देश के विकास में बड़ी बाधा है।

हमें, एक शिक्षित नागरिक के रूप में, इस तथ्य से अवगत होना चाहिए कि जितना अधिक हम वंशवादों का समर्थन करेंगे, उतना ही हम गंदी और विभाजनकारी राजनीतिक शक्ति के समक्ष झुकते जायेंगे । हमें इस जाल से मुक्त होना होगा और अधिक सक्षम नेताओं के साथ अपने देश को बेहतर भविष्य की ओर ले जाना होगा और यह धीरे धीरे हो रहा है, जनता में चेतना आ रही – नए, उदीयमान और विकासोन्मुखी नेतृत्व सामने आ रहा है।
भारत की बात करें तो यह दृष्टिगोचर है। नेहरू-गाँधी परिवार का देश की राजनीति में दखल कमज़ोर होता जा रहा है।महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार पर संकट छाया हुआ है। उत्तर प्रदेश में मुलायम यादव परिवार में विभाजन हो चुका है, वायएसआर परिवार दो -फाड़ हो चुका है और अपरिवारवादी सत्ता पश्चिम बंगाल में और बाकी राज्यों में लोकतान्त्रिक पार्टियों की सरकार आ चुकी है।भारत ही नहीं शायद विश्व में, वंशवादी राजनीति एक ढलता सूरज है और अब परिवारवाद की राजनीति से जनता का मोहभंग हो रहा है। अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत की राजनीति शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजर रही है।

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